शंकराचार्य की ‘रोको-टोको-ठोको’ के साथ मैदान में उतरी चतुरंगिणी सेना”

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

काशी… जहां हर गली में इतिहास सांस लेता है, वहीं अब एक नया नारा गूंजा है जो सीधे दिल और दिमाग दोनों पर दस्तक देता है। “रोको, टोको और ठोको” — यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि एक चेतावनी, एक घोषणा और शायद एक नई बहस की शुरुआत है। विद्यामठ आश्रम से उठी यह आवाज अब पूरे देश के कानों में गूंज रही है।

काशी से उठी नई रणनीति

Varanasi के विद्यामठ आश्रम में Swami Avimukteshwaranand Saraswati ने ‘श्रीशंकराचार्य चतुरंगिणी सेना सभा’ के गठन का ऐलान कर दिया है।

27 सदस्यों की कोर टीम के साथ शुरू हुई यह पहल सिर्फ एक संगठन नहीं… बल्कि एक मनोवैज्ञानिक मिशन की तरह पेश की जा रही है।

शंकराचार्य का कहना है कि समाज के भीतर डर बैठ गया है — लोग गलत देखते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। अब यह “चुप्पी” तोड़ने का दावा किया जा रहा है।

चतुरंगिणी सेना: नाम में ही रणनीति

‘चतुरंगिणी’ — यानी चार भागों में बंटी एक संगठित शक्ति। यह सेना समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़कर एक अनुशासित ढांचा बनाने का दावा करती है।

मुख्य एजेंडा गौ-तस्करी पर रोक। सनातन प्रतीकों की रक्षा। सामाजिक सुरक्षा का भाव बढ़ाना। ब्राह्मणों व धार्मिक वर्गों पर अत्याचार का विरोध।

कागज पर यह “संगठन” है… लेकिन सियासत की भाषा में यह एक “मैसेज” है।

‘रोको, टोको, ठोको’ — नारा या रणनीति?

यह तीन शब्द किसी फिल्मी डायलॉग जैसे लगते हैं, लेकिन यहां इन्हें एक क्रमबद्ध कार्रवाई बताया गया है:

  • रोको → पहले समझाओ, रोकने की कोशिश करो
  • टोको → नियम-कानून का हवाला देकर चेतावनी दो
  • ठोको → आखिरी विकल्प, सख्त कार्रवाई

शंकराचार्य ने साफ किया है कि “ठोको” का मतलब अराजक हिंसा नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर कड़े कदम उठाना है।

फिर भी सवाल वही पुराना… “लकीर कहां खिंचेगी?”

डर बनाम ‘डराने का इलाज’

समाज में डर है — ये बात सच है। लेकिन डर हटाने के लिए “डर जैसा दिखने वाला नारा” देना… यह भारतीय पॉलिटिक्स और धर्म की पुरानी केमिस्ट्री है।

एक तरफ कहा जा रहा है “हम आक्रामक नहीं हैं”…दूसरी तरफ नारा ऐसा है जो WhatsApp यूनिवर्स में ‘Action Trailer’ की तरह वायरल हो चुका है।

यानी कहानी वही है — “हम शांति चाहते हैं… लेकिन पोस्टर थोड़ा एक्शन वाला होगा।”

कानून, धर्म और सीमा की बहस

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसा संगठन सामाजिक सुरक्षा देगा या फिर एक नई बहस को जन्म देगा? भारत जैसे लोकतंत्र में हर पहल को संविधान के दायरे में रहना होता है। यहां संतुलन बहुत नाजुक है जहां धर्म, भावना और कानून तीनों एक ही मंच पर खड़े हैं।

पहल या पॉलिटिकल पिच?

चतुरंगिणी सेना… किसी के लिए सुरक्षा की ढाल, तो किसी के लिए चिंता की घंटी। काशी से उठी यह पहल अब सिर्फ धार्मिक नहीं रही… यह सामाजिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुकी है। अब देखना यह है कि यह “डर हटाने का अभियान” बनती है…या फिर एक नया “डर का नैरेटिव” तैयार करती है।

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